बैतूल। (रिपोर्ट कौशल घोडके) मध्य प्रदेश आदिवासी कांग्रेस ने जिला स्तरीय सिविल जजों की चयन प्रक्रिया में आरक्षण अधिनियम-1994 का पालन न किए जाने का गंभीर आरोप लगाया है। इस मुद्दे को लेकर आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामू टेकाम के नेतृत्व में डिप्टी कलेक्टर के माध्यम से राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन में यह आरोप लगाया गया है कि उच्च न्यायालय, जबलपुर द्वारा सिविल जजों के चयन में अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए आरक्षित पदों को सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से भरा जा रहा है, जो आरक्षण अधिनियम-1994 के उल्लंघन का स्पष्ट उदाहरण है।
टेकाम ने बताया कि आरक्षण अधिनियम की धारा 3(ए) के तहत अगर किसी वर्ष में आरक्षित वर्ग के लिए कोई रिक्ति नहीं भरी जाती है, तो उसे अगले वर्ष के लिए आरक्षित रखा जाना चाहिए। लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा एससी/एसटी वर्ग के पदों को पात्र उम्मीदवारों की कमी के आधार पर सामान्य वर्ग में परिवर्तित कर दिया जा रहा है। यह संविधान के अनुच्छेद 335 और अधिनियम 1994 का उल्लंघन है।
— चयन समिति में एससी/एसटी/OBC का प्रतिनिधित्व नहीं–
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि चयन समिति में एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल नहीं किया गया है, जबकि अधिनियम के तहत यह अनिवार्य है। सिविल जजों के पद राज्य सरकार के होते हैं, जिन्हें उच्च न्यायालय एक भर्ती एजेंसी के रूप में कार्य करते हुए भरता है, लेकिन इस प्रक्रिया में शासन के नियमों और अधिनियम का पालन नहीं किया गया है।
— रिवर्स रिजर्वेशन का आरोप–
आदिवासी कांग्रेस ने ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया कि उच्च न्यायालय द्वारा रिवर्स रिजर्वेशन की प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिसके तहत अनारक्षित पदों को सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों से भरा जा रहा है, जबकि आरक्षित वर्ग के प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को मुख्य परीक्षा से बाहर कर दिया जाता है। इसका उदाहरण हाल ही में जिला न्यायालयों में 1255 पदों की भर्ती में देखा गया, जहां ओबीसी का कटऑफ 87 अंक और सामान्य वर्ग का 74 अंक था।
नियुक्तियों को शून्य घोषित करने की मांग
आदिवासी कांग्रेस ने मांग की है कि उच्च न्यायालय द्वारा की गई सभी नियुक्तियों को शून्य घोषित किया जाए, क्योंकि इनमें आरक्षण अधिनियम-1994 का पालन नहीं किया गया है। साथ ही साक्षात्कार में न्यूनतम पासिंग मार्क्स की अनिवार्यता समाप्त की जाए, क्योंकि यह प्रक्रिया विधि सम्मत नहीं है।
न्यायिक सेवाओं में प्रतिनिधित्व की कमी
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि मध्य प्रदेश की जिला स्तरीय न्यायिक सेवाओं में एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग का उचित प्रतिनिधित्व नहीं है, जबकि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत शासकीय सेवाओं में प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान है। आदिवासी कांग्रेस ने इसके समाधान के लिए उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए फैसलों का भी हवाला दिया। आदिवासी कांग्रेस ने इस ज्ञापन को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग और मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को भी भेजा है, ताकि इस मामले में आवश्यक कार्रवाई की जा सके। ज्ञापन देने वालों में रामू टेकाम प्रदेश अध्यक्ष आदिवासी कांग्रेस मप्र, डॉ रमेश काकोडिया जिला अध्यक्ष बैतूल आदिवासी कांग्रेस, विशाल परते जिला महामंत्री, गणेश पांसे सचिव, रोहित नागले, कैलाश परते आदि उपस्थित रहे।





